महात्मा गांधी को केवल अतीत का नेता मानना उनकी सोच के साथ अन्याय होगा। उनका चिंतन समय की सीमाओं से परे था। वे उस आधुनिक सभ्यता की बुनियादी संरचना को समझते थे, जो मशीन, पूंजी और शक्ति के केंद्रीकरण पर आधारित है। आज जब ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना को तेजी से बदल रहे हैं, तब गांधी जी की चेतावनियाँ और समाधान दोनों अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं।
गांधी जी मशीन के विरोधी नहीं थे। वे इस बात के विरोधी थे कि मशीन मनुष्य की जगह ले ले, उसके श्रम, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को निगल जाए। उनका मानना था कि इस संसार की सबसे उत्तम मशीन मानव शरीर है, जिसमें श्रम करने के साथ-साथ विवेक, करुणा और नैतिकता का अद्भुत संतुलन है। यह जीवित मशीन किसी कृत्रिम मशीन के साम्राज्य की गुलाम न बने, यही गांधी की मूल चिंता थी।
ऑटोमेशन और आधुनिक तकनीक के आने से पहले, किसी फैक्टरी, कंपनी या प्रोडक्शन हाउस में बड़ी संख्या में लोग काम करते थे। उत्पादन मानव श्रम पर आधारित था। कंपनी जो लाभ कमाती थी, उसका एक बड़ा हिस्सा मजदूरी और वेतन के रूप में काम करने वालों के पास जाता था और शेष मुनाफा कंपनी मालिक के पास रहता था। इस व्यवस्था में श्रम और पूंजी के बीच एक न्यूनतम संतुलन मौजूद था।
आज यह संतुलन टूट चुका है। मशीन के ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव से काम करने वालों की संख्या लगातार घटती जा रही है। उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है और मुनाफा भी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन यह पूरा मुनाफा लगभग पूरी तरह कंपनी मालिकों और पूंजी के केंद्रों के पास सिमटता जा रहा है। श्रमिकों की भागीदारी न के बराबर रह गई है। इसका सीधा परिणाम समाज में बढ़ती आर्थिक असमानता के रूप में सामने आ रहा है।
आज अमीरी और गरीबी की खाई बहुत तेजी से चौड़ी हो रही है। एक ओर तकनीक और पूंजी के मालिक अभूतपूर्व संपत्ति अर्जित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी, असुरक्षा और हताशा बढ़ती जा रही है। यदि यही प्रक्रिया इसी गति से चलती रही, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में गरीब और बेरोजगार वर्ग एक नई तरह की गुलामी की चपेट में आ सकता है। यह गुलामी शारीरिक नहीं होगी, बल्कि तकनीकी निर्भरता, कर्ज और असमान अवसरों की गुलामी होगी।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में आर्थिक समानता और स्वतंत्रता का संतुलन कैसे बनाया जाए। आखिर वह सूत्र क्या हो सकता है, जिससे तकनीक का लाभ पूरे समाज तक पहुँचे और न कि केवल कुछ लोगों तक सीमित रहे। इसका उत्तर गांधी के विचारों में छिपा हुआ है। इसका एकमात्र उपाय ताकत के विकेन्द्रीयकरण में निहित है।
यह ताकत केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि औद्योगिक और कौशल प्रशिक्षण की ताकत भी है। आज इस देश की हवा, पानी, जमीन और हर एक प्राकृतिक संपदा पर हर देशवासी का बराबर हक है। लेकिन जब इन संसाधनों का नियंत्रण राजनीतिक ताकत के माध्यम से औद्योगिक घरानों को सौंप दिया जाता है, तब आम जनता को उसका सीधा लाभ नहीं मिलता। जनता को केवल टैक्स के रूप में उसका हिस्सा मिलता है, जिससे सरकार अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने का दावा करती है।
अब जब उत्पादन का बड़ा हिस्सा रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से हो रहा है, तो एक नया और गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। इस तकनीक से होने वाली कमाई से होने वाले लाभ में इस देश के नागरिकों का हिस्सा कितना है? आखिर प्राकृतिक संसाधनों पर उसका भी जीते जी मालिकाना नैतिक हक है, फिलहाल यह पूरा लाभ कंपनी मालिकों के पास जा रहा है, लेकिन नैतिक रूप से भी और वर्तमान असंतुलन को दूर करने के लिए भी इसका लाभांश समाज में नीतिगत रूप से वितरित होना चाहिए। यदि मशीनें मानव श्रम का स्थान ले रही हैं, तो उस श्रम के बदले मिलने वाला लाभांश समाज के उन हिस्सों तक क्यों न पहुँचे, जो बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं?
सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए कि तकनीक आधारित मुनाफे का एक हिस्सा बेरोजगार युवाओं में कैसे वितरित किया जाए। यह वितरण केवल सहायता या दान के रूप में नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में होना चाहिए। साथ ही, उन युवाओं को नए कौशलों में प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वे बदलती अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक भूमिका निभा सकें। कौशल प्रशिक्षण का विकेन्द्रीयकरण, स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा और सामुदायिक उत्पादन संरचनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
गांधी जी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि आर्थिक और नैतिक स्वतंत्रता भी था। वे चाहते थे कि उत्पादन के साधन समाज के अधिकतम लोगों के हाथों में हों, न कि कुछ चुनिंदा लोगों के। आज के समय में इसका अर्थ यह है कि तकनीक पर नियंत्रण भी लोकतांत्रिक और सामाजिक होना चाहिए।
यूरोपियन देशों में जिस तरह से नागरिकों को सुविधाएँ, अधिकार और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं, वे इस बात का उदाहरण हैं कि आधुनिक तकनीक के साथ सामाजिक न्याय को कैसे जोड़ा जा सकता है। वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी भत्ता, पुनः प्रशिक्षण और सम्मानजनक जीवन को राज्य की जिम्मेदारी माना जाता है। भारत जैसे देश में, जहाँ जनसंख्या बड़ी है और असमानताएँ गहरी हैं, इन आयामों पर और भी गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
यह सच है कि अब पीछे लौटना संभव नहीं है। तकनीक को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन यह तय करना हमारे हाथ में है कि तकनीक किसके लिए काम करेगी। गांधी की दूरदर्शिता हमें यही सिखाती है कि यदि शक्ति, संसाधन और तकनीक का विकेन्द्रीयकरण नहीं हुआ, तो भविष्य और भी असमान, अन्यायपूर्ण और अस्थिर होगा।
अंततः प्रश्न यही है कि क्या हम मशीन और मुनाफे को मनुष्य से ऊपर रखेंगे, या मनुष्य को केंद्र में रखकर तकनीक का उपयोग करेंगे। गांधी जी का उत्तर स्पष्ट था। आज भी वही उत्तर हमारे सामने एक रास्ते की तरह मौजूद है।
- सौरभ त्यागी
राष्ट्रीय सचिव, अखिल भारतीय किसान कांग्रेस

सुंदर सारगर्भित लेख। समसामयिक
सौरभ भैया! वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर सटीक लेख लिखा है। गांधी जी के स्वराज की कल्पना को शानदार ढंग से आपने सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाने का उत्कृष्ट कार्य किया है।
राजनीति के साथ साथ संसाधनों, अवसरों के विकेंद्रीकरण भी अत्यन्त आवश्यक है वरना कभी सोने की चिड़िया रहा भारत जल्दी ही बेरोजगारों का देश बन जाएगा।