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आरएलएम में टूट, मंत्री पद और परिवारवाद के आरोपों के बीच उपेंद्र कुशवाहा ने बहू साक्षी मिश्रा को लेकर चली खबरों पर चुप्पी तोड़ी – एक्स पर दिया तंजभरा जवाब

Swaraj Times Desk: बिहार की राजनीति एक बार फिर चर्चाओं से भरी हुई है—and इस बार बात नीतिगत निर्णय या विकास योजनाओं की नहीं, बल्कि परिवारवाद और पद–वाटप को लेकर उठी अटकलों की है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के संस्थापक और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा एक बार फिर सुर्खियों में आए हैं। आरोप लगाया जा रहा था कि बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने के बाद अब वह अपनी बहू साक्षी मिश्रा को भी किसी अहम पद पर बैठाने की तैयारी कर रहे हैं।

आरोपों पर कुशवाहा का कड़ा तंज

शनिवार देर रात X (पूर्व ट्विटर) पर कुशवाहा ने तीखा लेकिन व्यंग्यपूर्ण पोस्ट करते हुए इन खबरों को सिरे से नकार दिया। उन्होंने लिखा —

“आज एक खबर देखने/पढ़ने को मिली मीडिया में। खबरें प्लांट करवाने और करने वाले को धन्यवाद। मज़ा आ गया। वाह भाई वाह! चलिए किसी बहाने सुर्खियां तो बटोरी। ऐसी फ़ालतू खबरें भी मीडिया में चलती/बिकती हैं… आश्चर्य है!”

कुशवाहा का यह जवाब साफ संकेत देता है कि वह इन अटकलों को बेबुनियाद और राजनीतिक अफवाह करार दे रहे हैं।


परिवारवाद पर क्यों उठ रहे सवाल?

बिहार विधानसभा चुनाव के बाद RLM के टिकट पर जीते कई विधायकों की जगह सीधा कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री पद मिला।
कहा गया कि विधायक किनारे कर दिए गए और परिवार को प्राथमिकता दी गई।
इसी पृष्ठभूमि के आधार पर, कुछ मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि अब बहू साक्षी मिश्रा को भी “महत्वपूर्ण पद” दिए जाने की तैयारी है।

साक्षी मिश्रा जब इस साल राजनीति को लेकर पहली बार सवालों के घेरे में आईं थीं, तब उन्होंने खुद कहा था —

“अभी राजनीति में आने का कोई प्लान नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा था कि पति के मंत्री बनने का फैसला अचानक नहीं था—बल्कि परिवार और पार्टी दोनों की सहमति से हुआ।


RLM में अंदरूनी खींचतान भी जारी

इसी बीच, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अंदर हलचलें बढ़ती जा रही हैं।
कई कार्यकर्ता और स्थानीय स्तर के नेता हाल ही में लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) में शामिल हो गए।
बताया जाता है कि कुछ दिन पहले कुशवाहा द्वारा आयोजित विधायकों की बैठक–पार्टी में तीन विधायक अनुपस्थित रहे—जिसे राजनीतिक गलियारों में “नाराजगी” और “असंतोष” का संकेत माना जा रहा है।

विश्लेषक मानते हैं कि गठबंधन राजनीति में दल–बदल और असंतोष आम है, लेकिन परिवारवाद का टैग किसी भी दल की भविष्य की छवि पर असर डाल सकता है—खासकर ऐसे समय में जब बिहार की सत्ता समीकरण लगातार बदल रहे हैं।


आगे की सियासत कैसी दिखती है?

कुशवाहा के बयान के बाद फिलहाल बहू साक्षी मिश्रा के भूमिका निभाने की अटकलें थंडी पड़ती दिख रही हैं, लेकिन राजनीति में “ना” अक्सर सिर्फ समय का संकेत होता है।
अब ध्यान इस पर टिका है कि—
क्या RLM एकजुट होकर NDA के साथ अपनी भूमिका निभा पाएगा?
या आने वाले महीनों में और भी नए सियासी समीकरण देखने को मिलेंगे?

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