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ढाका में शिष्टाचार की एक झलक को पाकिस्तान ने ‘बड़ी जीत’ बताया,
लेकिन भारत ने मिनटों में हवा निकाल दी!

Swaraj Times Desk: बांग्लादेश की राजधानी ढाका इस समय केवल पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार को लेकर सुर्खियों में नहीं रही, बल्कि भारत–पाकिस्तान के बीच एक नई राजनीतिक नोकझोंक का भी मंच बन गई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर सरदार अयाज सादिक के बीच एक साधारण-सी हाथ मिलाने की घटना को पाकिस्तान ने ऐसा प्रस्तुत किया मानो कोई ऐतिहासिक वार्ता या तल्ख संबंधों में ‘बर्फ पिघलने’ जैसा बड़ा कदम उठ गया हो।

अंतिम संस्कार में पहुंचे वैश्विक प्रतिनिधि

बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद 31 दिसंबर को ढाका में राजकीय स्तर पर आयोजित अंतिम संस्कार में कई देशों के अधिकारी मौजूद रहे। भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहुंचे, जबकि पाकिस्तान ने अपनी ओर से स्पीकर सरदार अयाज सादिक को भेजा। वैश्विक प्रतिनिधियों के बीच एक स्थान पर आमना–सामना होने पर दोनों नेताओं ने शिष्टाचार के तहत एक हल्की-सी मुलाकात की और हाथ मिलाया — बस, इसके आगे कुछ नहीं।

पाकिस्तान की पुरानी आदत – छोटी बात का बड़ा तमाशा

इस छोटे से दृश्य को पाकिस्तान के मीडिया और सरकारी तंत्र ने तुरंत “भारत–पाकिस्तान की पहली उच्चस्तरीय बैठक” का नाम दे दिया। बयानों में दावा किया गया कि पाकिस्तान भारत के साथ “शांति और संवाद” के लिए हमेशा तैयार है — मानो जयशंकर ने इस क्षण में ही किसी वार्ता का अध्याय खोल दिया हो।

भारत ने सेकंडों में शांत की सनक

भारत ने तुरंत ही इस पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया —
यह कोई बैठक नहीं
यह कोई वार्ता नहीं
यह सिर्फ औपचारिक शोक अवसर पर शिष्टाचार था

भारतीय अधिकारियों ने सख्त लहजे में कहा कि पाकिस्तान का इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना “अनुचित और गैरजरूरी” है। भारत ने यह भी याद दिलाया कि कूटनीति में ऐसी औपचारिक मुलाकातें सम्मान प्रकट करने के दायरे में आती हैं, न कि राजनीतिक रणनीति में।

पाकिस्तान पर दोहरे रवैये का आरोप

भारत ने यह भी सवाल उठाया —
जिस देश की सेना लगातार भारत पर हमले के आरोप से बचती रही हो, सीमा पर ड्रोन भेजकर हथियार गिराती हो, वह विदेश में मंच पर शांति और भाईचारे का संदेश कैसे बेच सकता है?

ढाका में हुआ एक साधारण हाथ मिलाना, भारत की कूटनीतिक शालीनता का उदाहरण था — लेकिन पाकिस्तान ने इसे फिर से प्रचार का हथियार बना लिया। भारत के एक छोटे से स्पष्टीकरण ने यह बता दिया कि भारतीय विदेश नीति में भावनात्मक व व्यर्थ बयानबाजी की कोई जगह नहीं — यहां काम होता है तथ्यों और गरिमा से।


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