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विधानसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु में फिर गरमाया हिंदी विरोध, 1965 की यादों ने बढ़ाया सियासी तापमान

Swaraj Times Desk: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही भाषा और अस्मिता की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है. इसी कड़ी में डीएमके अध्यक्ष और मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन की याद दिलाते हुए ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी. ‘भाषा शहीद दिवस’ के मौके पर उन्होंने न सिर्फ उस आंदोलन में जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि दी, बल्कि साफ शब्दों में कहा कि तमिलनाडु में हिंदी की न कभी जगह थी और न आगे कभी होगी.

1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन क्या था?

साल 1965 तमिलनाडु के इतिहास में भाषा संघर्ष का अहम मोड़ माना जाता है. उस समय केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू करने की कोशिशों के खिलाफ राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे. इन आंदोलनों में कई छात्रों और युवाओं ने अपनी जान गंवाई. तमिल समाज ने इसे अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान पर हमला माना. यही वजह है कि आज भी 1965 का आंदोलन तमिल राजनीति में भावनात्मक मुद्दा बना हुआ है.

स्टालिन ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री स्टालिन ने भाषा शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा,
“यह वह राज्य है जिसने अपनी भाषा से अपनी जान की तरह प्यार किया. जब भी हिंदी थोपने की कोशिश हुई, तमिलनाडु ने पूरी ताकत से उसका विरोध किया.”
उन्होंने आगे कहा कि तमिलनाडु की पहचान उसकी भाषा से है और इस पहचान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा.

वीडियो शेयर कर दिया सियासी संदेश

स्टालिन ने इस मौके पर सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक वीडियो भी साझा किया, जिसमें 1965 के आंदोलन की झलक दिखाई गई. इस वीडियो में प्रदर्शन, शहीदों की तस्वीरें और तमिल अस्मिता की झलक थी. वीडियो के साथ दिए गए संदेश को चुनावी रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि इससे डीएमके का पारंपरिक हिंदी-विरोधी रुख फिर से मजबूत होता नजर आया.

चुनावी साल में क्यों अहम है यह बयान?

तमिलनाडु में भाषा का मुद्दा हमेशा चुनावी राजनीति का अहम हथियार रहा है. डीएमके और उसके समर्थक इसे तमिल अस्मिता की रक्षा से जोड़ते हैं. ऐसे समय में जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, स्टालिन का यह बयान न सिर्फ केंद्र सरकार की भाषा नीति पर निशाना माना जा रहा है, बल्कि यह अपने वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश भी है.

भविष्य में क्या संकेत?

स्टालिन के बयान से साफ है कि आने वाले महीनों में भाषा और केंद्र-राज्य संबंध तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा मुद्दा बने रहेंगे. 1965 की याद दिलाकर डीएमके एक बार फिर यह संदेश दे रही है कि तमिल पहचान से जुड़ा कोई भी सवाल उसके लिए समझौते का विषय नहीं है.

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