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समानता बनाम विभाजन की बहस तेज, रैगिंग को नियमों में शामिल न करने पर भी अदालत ने उठाए तीखे सवाल

Swaraj Times Desk: UGC के नए “इक्विटी” नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को तीखी बहस देखने को मिली। मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत उस समय स्पष्ट रूप से नाराज़ दिखे, जब अदालत में यह दलील सामने आई कि विभिन्न जातियों—जनरल, SC, ST, OBC—के छात्रों के लिए अलग-अलग हॉस्टल होने चाहिए। इस सुझाव पर CJI ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए,” और सवाल उठाया कि क्या देश सामाजिक समरसता की दिशा में आगे बढ़ रहा है या उल्टी दिशा में जा रहा है।

“हम साथ पढ़े-रहे, अब दीवारें क्यों?”

सीजेआई ने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के छात्र एक ही हॉस्टल में रहते थे, और आज जब इंटर-कास्ट शादियां बढ़ रही हैं, तब संस्थानों में नए तरह की दीवारें खड़ी करने का विचार चिंताजनक है। उन्होंने संकेत दिया कि शिक्षा संस्थान समाज को जोड़ने की जगह हैं, बांटने की नहीं।

रैगिंग पर अदालत के तीखे सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि नए नियमों में रैगिंग का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं है। CJI ने कहा कि कॉलेजों में उत्पीड़न सिर्फ जाति आधारित नहीं होता; कई मामलों में सीनियर-जूनियर संस्कृति, क्षेत्रीय पहचान या भाषा के आधार पर भी भेदभाव होता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि दक्षिण या पूर्वोत्तर से आने वाले छात्रों पर अक्सर टिप्पणियां होती हैं—क्या ऐसे मामलों को भी नियमों में पर्याप्त सुरक्षा मिलती है?

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि नियमों की धारा 3(c) में भेदभाव को कुछ वर्गों तक सीमित करके देखा गया है, जिससे समानता के संवैधानिक सिद्धांत (अनुच्छेद 14) पर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना था कि भेदभाव किसी भी छात्र के साथ हो सकता है, इसलिए नियम सर्वसमावेशी होने चाहिए।

कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब सामान्य भेदभाव की परिभाषा पहले से मौजूद है, तो जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की क्या आवश्यकता थी। साथ ही अदालत ने यह संकेत दिया कि नियमों की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो सभी छात्रों के अधिकारों की रक्षा करे, न कि नई विभाजन रेखाएं खींचे।

यह मामला अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि शिक्षा परिसर में समानता बनाम पहचान आधारित सुरक्षा की राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।

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