• Mon. Mar 9th, 2026

औपनिवेशिक परंपराओं से ‘नए भारत’ की सांस्कृतिक पहचान तक — बजट की दिलचस्प कहानी

Swaraj Times Desk:आज जब वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman केंद्रीय बजट 2026 पेश करने जा रही हैं, उससे पहले राष्ट्रपति Droupadi Murmu द्वारा उन्हें दही-चीनी खिलाने की परंपरा चर्चा में है। इसे शुभ शुरुआत और सफलता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या अंग्रेजों के दौर में भी ऐसी कोई रस्म होती थी? जवाब है—नहीं।

ब्रिटिश दौर का पहला बजट

भारत का पहला औपचारिक बजट 7 अप्रैल 1860 को ब्रिटिश शासन के दौरान पेश किया गया था। इसे स्कॉटिश अर्थशास्त्री James Wilson ने पेश किया था, जो वायसराय की परिषद में वित्त सदस्य थे। यह बजट भारतीय जनता के लिए नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासन और ब्रिटिश हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

शाम 5 बजे क्यों पेश होता था बजट?

कई दशकों तक भारत का बजट शाम 5 बजे पेश किया जाता था। वजह भारत नहीं, बल्कि लंदन था। दिल्ली में शाम 5 बजे का समय लंदन में सुबह करीब 11:30 बजे के बराबर होता था, जिससे ब्रिटिश संसद उसी दिन भारतीय बजट पर चर्चा कर सके। यह परंपरा 1999 तक चली, बाद में इसे सुबह पेश करने की भारतीय व्यवस्था शुरू हुई।

ब्रीफकेस और ‘ग्लैडस्टोन बॉक्स’

ब्रिटिश परंपरा के तहत बजट दस्तावेज चमड़े के ब्रीफकेस में लाए जाते थे, जिसे “ग्लैडस्टोन बॉक्स” कहा जाता था। दिलचस्प बात यह है कि “बजट” शब्द फ्रेंच शब्द Bougette से आया है, जिसका मतलब होता है चमड़े का बैग। भारत में भी यह परंपरा लंबे समय तक चली, लेकिन अब इसकी जगह लाल कपड़े के पारंपरिक फोल्डर ने ले ली है।

लाल फाइलें और गोपनीयता

ब्रिटिश काल में बजट दस्तावेज लाल रंग की फाइलों में रखे जाते थे और उन्हें बेहद गोपनीय माना जाता था। यह परंपरा भी स्वतंत्र भारत में कई वर्षों तक जारी रही।

बदली पहचान, बदली परंपराएं

अब भारत ने औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी बनाकर सांस्कृतिक पहचान को प्राथमिकता दी है। चमड़े के ब्रीफकेस की जगह ‘बहीखाता’ शैली का लाल फोल्डर और दही-चीनी की शुभ परंपरा, आधुनिक भारतीय बजट की नई पहचान बन चुके हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *