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Union Budget 2026: आरडीजी खत्म, जीएसटी का झटका जारी — पहाड़ी राज्य की अर्थव्यवस्था पर दोहरा दबाव

Swaraj Times Desk: हिमाचल प्रदेश की सियासत में केंद्रीय बजट को लेकर नया बवाल खड़ा हो गया है। राज्य के डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री ने दावा किया है कि केंद्र सरकार के ताज़ा वित्तीय फैसलों और 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के चलते हिमाचल को हर साल लगभग 10,000 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान होगा। उनके मुताबिक यह अस्थायी झटका नहीं, बल्कि राज्य की वित्तीय संरचना को कमजोर करने वाला दीर्घकालिक संकट है।

डिप्टी सीएम ने कहा कि जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद से ही सीमित संसाधनों वाले पर्वतीय राज्यों पर दबाव बढ़ा है। पहले जीएसटी क्षतिपूर्ति बंद हुई और अब राजस्व घाटा अनुदान (RDG) समाप्त होने से दूसरा बड़ा झटका लगा है। उनका कहना है कि हिमाचल जैसे विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए यह निर्णय बेहद चिंताजनक है।

बजट संरचना पर असर

हिमाचल का कुल वार्षिक बजट करीब 58,000 करोड़ रुपये के आसपास है, जिसमें बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और अनिवार्य खर्चों में चला जाता है। ऐसे में केंद्रीय सहायता में कमी का मतलब है विकास कार्यों, इंफ्रास्ट्रक्चर और जनकल्याण योजनाओं पर सीधा असर। अग्निहोत्री ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में राज्य को करीब 38,000 करोड़ रुपये RDG के रूप में मिले थे, और उम्मीद थी कि यह सहायता आगे बढ़ेगी—लेकिन इसके उलट इसे खत्म कर दिया गया।

विशेष राज्य की दलील

उन्होंने दोहराया कि हिमाचल का गठन ही विशेष भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर हुआ था। पहाड़ी इलाकों में बुनियादी ढांचा बनाना महंगा है, राजस्व स्रोत सीमित हैं और प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम भी अधिक है। ऐसे में केंद्र की वित्तीय कटौतियां राज्य की विकास गति को प्रभावित कर सकती हैं।

बीजेपी से सीधा सवाल

डिप्टी सीएम ने राज्य के बीजेपी सांसदों और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर से स्पष्ट रुख बताने की मांग की—“वे केंद्र के साथ हैं या हिमाचल के?” उनके मुताबिक इतने बड़े वार्षिक नुकसान पर चुप्पी साधना प्रदेशहित के खिलाफ है।

इस बीच, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी बजट को निराशाजनक बताया और कहा कि RDG हटना राजनीतिक निर्णय लगता है। उन्होंने राज्य की खराब सड़कों का जिक्र करते हुए बताया कि 400 से ज्यादा सड़कें बंद हैं और नई ड्रेनेज पॉलिसी लाई जा रही है ताकि नुकसान कम हो।

हिमाचल में अब यह मुद्दा सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और क्षेत्रीय अस्मिता से भी जुड़ता जा रहा है।

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