Premanand Maharaj News: फूलों की होली, राधा-नाम का रस और प्रेम का असली रंग
Swaraj Times Desk: देशभर में होली की धूम के बीच वृंदावन की होली का रंग कुछ अलग ही होता है। खासकर जब बात हो संत Premanand Govind Sharan Ji Maharaj की, तो यह उत्सव सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम का महापर्व बन जाता है।
फूलों की होली, प्रेम का संदेश
वृंदावन स्थित Vrindavan में महाराज जी की होली पारंपरिक रंगों से ज्यादा फूलों से खेली जाती है। श्री हित राधा केली कुंज (वराह घाट) में होने वाली यह होली राधावल्लभ संप्रदाय की परंपरा से जुड़ी है। यहां गुलाल से अधिक पुष्प बरसते हैं और वातावरण राधा-कृष्ण के प्रेमरस से सराबोर हो जाता है।
महाराज जी का मानना है कि बाहरी रंग तो कुछ समय में धुल जाते हैं, लेकिन अंतर का प्रेम-रंग जीवनभर बना रहता है। उनके कीर्तन—“होली खेलत केलि कुंज में…” जैसे भजन—सुनते ही भक्त भावविभोर होकर झूम उठते हैं।
कीर्तन में डूबा भक्तिमय वातावरण
जब महाराज जी राधा नाम का उच्चारण करते हैं, तो पूरा परिसर “राधे-राधे” की ध्वनि से गूंज उठता है। उनकी होली में शोर-शराबा नहीं, बल्कि नाम-स्मरण और सत्संग का मधुर संगम होता है। वे होली को अनाचार से दूर रखने और इसे भक्ति का पर्व बनाने का संदेश देते हैं।
प्रह्लाद की कथा और आध्यात्मिक अर्थ
होली के अवसर पर महाराज जी प्रह्लाद-होलिका की कथा भी सुनाते हैं। वे बताते हैं कि सच्ची होली मन के विकारों को जलाने और भक्ति का रंग चढ़ाने का प्रतीक है। बारसाना-नंदगांव की चटकीली होली से अलग, उनकी होली शांत, सौम्य और आध्यात्मिक होती है।
कौन हैं प्रेमानंद महाराज?
महाराज जी का जन्म कानपुर के सरसौल में एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। कम उम्र में ही उन्होंने भक्ति मार्ग अपनाया और आगे चलकर राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित हुए। वर्षों तक साधना और सेवा के बाद वे वृंदावन में ही निवास करने लगे।
आज प्रेमानंद महाराज की होली सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा को रंगने का अवसर मानी जाती है—जहां हर भक्त प्रेम के रंग में डूब जाता है।
