अरावली पर्वत श्रृंखला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पर्यावरण को कितना खतरा?
Swaraj Times Desk: दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियां एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वजह है सुप्रीम कोर्ट का 20 नवंबर का फैसला, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तय की गई अरावली की नई परिभाषा को अदालत ने स्वीकार कर लिया। इस फैसले को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की कोशिश बताया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञ इसे अरावली के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं।
अरावली की नई परिभाषा क्या है?
केंद्र सरकार के अनुसार अब वही भूभाग अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जाएगा,
- जो अपने आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंचा हो
- या फिर 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या उससे अधिक पहाड़ियों का समूह हो
इस परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद अरावली के बड़े हिस्से को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संभावित असर
हालांकि कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली क्षेत्र के भीतर नई खनन लीज पर फिलहाल रोक लगा दी है, जब तक विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का मानना है कि नई परिभाषा के चलते करीब 60 प्रतिशत अरावली क्षेत्र में भविष्य में खनन का रास्ता खुल सकता है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि
- टिकाऊ खनन के स्पष्ट नियम बनाए जाएं
- अवैध खनन पर सख्ती की जाए
- ऐसे क्षेत्रों की पहचान हो, जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा
पर्यावरणविदों की चिंता क्यों बढ़ी?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले के बाद अरावली के कई अहम हिस्से कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकते हैं। इससे दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के अन्य इलाकों में
- गर्मी बढ़ने
- सूखे की समस्या
- मौसम के असंतुलन
जैसे खतरे गहराने की आशंका है।
करीब 700 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला थार रेगिस्तान से उठने वाली रेत और धूल को रोकने की प्राकृतिक दीवार है। साथ ही यह भूजल रिचार्ज और जैव विविधता के लिए भी बेहद जरूरी है।
अरावली को ‘उत्तर भारत का फेफड़ा’ क्यों कहा जाता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली चंबल, साबरमती और लूणी जैसी नदियों का जल स्रोत है।
सतत संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक हरजीत सिंह के मुताबिक, सिर्फ 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों को अरावली मानने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट होने का खतरा है, जो उत्तर भारत को “सांस और पानी” देता है।
वहीं, ‘वॉटरमैन ऑफ इंडिया’ राजेंद्र सिंह ने चेतावनी दी है कि अगर यह फैसला पूरी तरह लागू हुआ, तो अरावली का केवल 7–8 प्रतिशत हिस्सा ही बच पाएगा।
पीएम का ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट और अरावली का संबंध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट देश में बढ़ते मरुस्थलीकरण को रोकने की एक बड़ी पहल है। इसका उद्देश्य
- हरित आवरण बढ़ाना
- धूल और रेत के तूफानों को रोकना
- जलवायु परिवर्तन के असर को कम करना
इस परियोजना को अरावली क्षेत्र से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे
स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा
वायु गुणवत्ता सुधरेगी
भूजल स्तर बेहतर होगा
