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मध्यकालीन इतिहास पर बयान ने छेड़ी नई बहस, विरासत बनाम राजनीति आमने-सामने

Swaraj Times Desk:पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि इतिहास में जिन शासकों को “विदेशी आक्रमणकारी” बताया जाता है—जैसे महमूद गजनी या लोदी वंश—उन्हें पूरी तरह विदेशी कहना सही नहीं है। उनके अनुसार, उन्हें “भारतीय लुटेरे” कहना अधिक सटीक होगा, क्योंकि वे लंबे समय तक इसी भूभाग से जुड़े रहे। अंसारी के इस कथन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

बीजेपी का तीखा पलटवार

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इस बयान को इतिहास की “सफाई” करने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि यह कोई एक बयान नहीं, बल्कि एक पैटर्न है जिसमें मध्यकालीन आक्रमणों की हिंसा को कमतर दिखाया जाता है। पूनावाला ने आरोप लगाया कि ऐसे विचार उन शासकों के अत्याचारों को नज़रअंदाज़ करते हैं, जिन्होंने मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाया।

बीजेपी के एक अन्य नेता सी.आर. केसवन ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अंसारी का बयान चौंकाने वाला है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐतिहासिक हमलों और धार्मिक स्थलों पर हुए विनाश को “घरेलू संघर्ष” बताकर देखा जा सकता है। केसवन ने कहा कि भारत के इतिहास में कई आक्रमण ऐसे रहे हैं जिन्हें सिर्फ राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभावों के संदर्भ में भी समझना चाहिए।

क्या कहा था हामिद अंसारी ने?

अंसारी ने अपने बयान में कहा था कि इतिहास को सिर्फ “विदेशी बनाम भारतीय” के चश्मे से देखने की आदत राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन इससे जटिल ऐतिहासिक सच्चाइयों को समझना मुश्किल हो जाता है। उनका तर्क था कि कई शासक जो बाहर से आए, बाद में यहीं बस गए और सत्ता संरचना का हिस्सा बन गए—इसलिए उन्हें पूरी तरह “बाहरी” कहना ऐतिहासिक रूप से अधूरा है।

बहस का बड़ा संदर्भ

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश में इतिहास की व्याख्या, पाठ्यपुस्तकों की सामग्री और सांस्कृतिक विरासत को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। एक पक्ष इसे ऐतिहासिक दृष्टिकोण की जटिलता बताता है, तो दूसरा इसे “इतिहास के घावों को हल्का करने” की कोशिश मानता है।

स्पष्ट है कि यह बहस सिर्फ अतीत की नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक विमर्श और पहचान की राजनीति से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

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