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Swaraj Times Desk: बांग्लादेश में बीते कुछ समय से भारत-विरोधी माहौल तेज़ी से उभरता दिख रहा है। 2024 के छात्र आंदोलन के बाद सत्ता में आई मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार को शुरुआत में कई इस्लामिक संगठनों का समर्थन मिला, लेकिन अब यही ताकतें देश में कट्टरपंथ, हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा दे रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि फरवरी 2026 में प्रस्तावित चुनाव से पहले ये समूह सरकार पर दबाव बनाने और माहौल बिगाड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा असर बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय पर पड़ रहा है, जिन पर हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2024 से मार्च 2025 के बीच हजारों हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें मंदिरों पर हमले, संपत्ति की तोड़फोड़ और हत्याएं शामिल हैं। इन हालातों के पीछे केवल कमजोर शासन ही नहीं, बल्कि कुछ प्रभावशाली कट्टरपंथी संगठन और चेहरे भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

पहला बड़ा कारक जमात-ए-इस्लामी है, जिस पर पहले प्रतिबंध था। यूनुस सरकार के सत्ता में आते ही यह रोक हटाई गई, जिसके बाद संगठन फिर से सक्रिय हो गया। यह समूह खुद को चुनाव सुधारों का समर्थक बताता है, लेकिन इसके कार्यकर्ताओं पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भारत-विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं।

दूसरा अहम संगठन हिफाजत-ए-इस्लाम है, जो शरिया कानून लागू करने की खुली वकालत करता है। महिलाओं के अधिकारों और सेक्युलर सुधारों के खिलाफ इसके आंदोलन अक्सर सड़कों पर नजर आते हैं। विशाल मदरसा नेटवर्क के कारण इसका प्रभाव जमीनी स्तर तक फैला हुआ है।

तीसरा नाम हिज्ब-उत-तहरीर का है, जो युवाओं को सोशल मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों के जरिए प्रभावित कर रहा है। इस संगठन पर खलीफा शासन की मांग और आईएसआईएस जैसी विचारधाराओं से प्रेरित होने के आरोप लगते रहे हैं। इसके झंडे ढाका जैसे शहरों में दिखाई देना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

चौथा समूह इंकलाब मंच है, जो छात्र आंदोलन के बाद उभरा। इसके नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद हालात और बिगड़ गए। इस संगठन ने सरकार के खिलाफ खुला मोर्चा खोलते हुए हिंसक प्रदर्शन किए और मीडिया संस्थानों को भी निशाना बनाया।

पांचवां और सबसे खतरनाक पहलू कुछ कट्टर चेहरों का प्रभाव है। अल-कायदा से जुड़े अंसारुल्लाह बंग्ला टीम के नेता मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी की रिहाई और मामुनुल हक की दोबारा सक्रियता ने कट्टर नेटवर्क को नई ऊर्जा दी है। इनकी विचारधारा न केवल बांग्लादेश, बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए भी चुनौती मानी जा रही है।

कुल मिलाकर, ये सभी ताकतें मिलकर भारत-विरोधी भावनाओं को भड़का रही हैं और बांग्लादेश को कट्टरपंथ की ओर धकेल रही हैं। यूनुस सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह लोकतांत्रिक सुधारों के साथ-साथ इन उग्र तत्वों पर कैसे लगाम लगाती है, ताकि देश को और अधिक अस्थिर होने से बचाया जा सके।

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