Tarique Rahman: BNP की जीत के बाद दक्षिण एशिया की सियासत में नई चाल, दिल्ली सतर्क, इस्लामाबाद उत्सुक
Swaraj Times Desk: बांग्लादेश के आम चुनाव में Tarique Rahman की अगुवाई वाली Bangladesh Nationalist Party (BNP) को बंपर जीत मिली है। यह चुनाव 2024 की हिंसा और सत्ता परिवर्तन के बाद हुआ पहला बड़ा लोकतांत्रिक इम्तिहान था। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नई सरकार भारत के करीब जाएगी या पाकिस्तान-चीन धुरी की तरफ झुकेगी?
17 साल बाद वापसी, बदला राजनीतिक समीकरण
60 वर्षीय तारिक रहमान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं। भ्रष्टाचार मामलों के चलते वे वर्षों तक विदेश में रहे। दिसंबर 2025 में अपनी मां के निधन के बाद उनकी वापसी ने बांग्लादेशी राजनीति को नई ऊर्जा दी। बड़े जनसमूह के बीच उन्होंने ‘मेरे पास बांग्लादेश के लिए योजना है’ कहकर चुनावी अभियान की शुरुआत की और जनता ने उन्हें भारी समर्थन दिया।
भारत की ‘पहली बधाई’, क्या संदेश?
चुनाव परिणाम आते ही प्रधानमंत्री Narendra Modi ने तारिक रहमान को बधाई दी। संदेश सामान्य था, लेकिन रणनीतिक रूप से अहम। भारत ने साफ संकेत दिया कि वह स्थिर, लोकतांत्रिक और समावेशी बांग्लादेश के साथ रिश्ते मजबूत रखना चाहता है। पिछले डेढ़ साल में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता, साथ ही अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाओं ने दिल्ली की चिंता बढ़ाई थी।
भारत की तीन बड़ी चिंताएं
- पाक-चीन-बांग्लादेश धुरी: अगर ढाका इस्लामाबाद और बीजिंग के करीब जाता है, तो यह पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिहाज से चुनौती बन सकता है।
- सीमा और अवैध घुसपैठ: सीमा प्रबंधन और आतंरिक सुरक्षा दिल्ली की प्राथमिकता है।
- व्यापार संतुलन: भारत का बांग्लादेश के साथ करीब 10 अरब डॉलर का व्यापार सरप्लस है। टेक्सटाइल सेक्टर में भारत कच्चा कपास सप्लाई करता है, जो ढाका की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है।
जमात की हार, भारत के लिए राहत
कट्टरपंथी Jamaat-e-Islami इस बार सत्ता समीकरण से बाहर है। यह भारत के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि जमात को पाकिस्तान समर्थक और अल्पसंख्यकों के प्रति कठोर रुख के लिए जाना जाता है। अगर जमात सरकार का हिस्सा बनती, तो दिल्ली-ढाका रिश्तों में तनाव बढ़ सकता था।
चीन फैक्टर और मोंगला पोर्ट
चीन पहले से ही बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहा है, खासकर Mongla Port के आधुनिकीकरण में। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये प्रोजेक्ट्स भविष्य में सामरिक उपयोग के लिहाज से अहम हो सकते हैं। श्रीलंका और पाकिस्तान में चीन की भूमिका को देखते हुए भारत इस पहलू पर बारीकी से नजर रख रहा है।
‘बांग्लादेश पहले’ बनाम ‘संतुलित कूटनीति’
तारिक रहमान ने कहा है कि वे भारत के हितों का सम्मान करेंगे, लेकिन उनकी प्राथमिकता ‘बांग्लादेश पहले’ होगी। इसका मतलब यह हो सकता है कि रिश्ते भावनात्मक दोस्ती से ज्यादा व्यावहारिक और लेन-देन आधारित होंगे।
दिल्ली फिलहाल ‘रुको और देखो’ की नीति पर है। संकेत मिल रहे हैं कि नई सरकार टकराव से बचेगी, लेकिन पाकिस्तान और चीन के साथ सीमित संतुलन भी बनाए रख सकती है।
आगे की दिशा
तारिक रहमान की सरकार किस ओर झुकेगी, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा। पर इतना तय है कि ढाका की नई राजनीतिक दिशा पूरे दक्षिण एशिया की रणनीतिक तस्वीर बदल सकती है।
