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दिशोम गुरु के सम्मान पर सियासी घमासान, पप्पू यादव और हेमंत सोरेन ने भारत रत्न की उठाई मांग

Swaraj Times Desk: झारखंड आंदोलन के प्रणेता और वरिष्ठ आदिवासी नेता Shibu Soren को पद्म भूषण से सम्मानित किए जाने के बाद सियासी प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है. जहां एक ओर इसे आदिवासी समाज के संघर्ष को मिला सम्मान बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस पर सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह सम्मान उनके योगदान के अनुरूप है. बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद Pappu Yadav ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पद्म भूषण को अपर्याप्त बताया और शिबू सोरेन को भारत रत्न दिए जाने की खुली मांग कर दी.

‘गुरुजी सम्मान के मोहताज नहीं’ – पप्पू यादव

पप्पू यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन आदिवासी अस्मिता, अधिकार और पहचान के सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं. उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन आज़ादी के बाद के सबसे बड़े आदिवासी राजनेता हैं और उन्हें भारत रत्न से नवाजा जाना चाहिए. पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि पद्म भूषण देना मोदी सरकार की आदिवासी समाज के प्रति “हीन भावना” को दर्शाता है. उनके शब्दों में, गुरुजी किसी सम्मान के मोहताज नहीं हैं, बल्कि सम्मान खुद उनके संघर्ष से छोटा पड़ जाता है.

हेमंत सोरेन का भावुक बयान

इस सम्मान पर झारखंड के मुख्यमंत्री और शिबू सोरेन के पुत्र Hemant Soren ने भी गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन भारत रत्न थे, हैं और सदैव रहेंगे. हेमंत सोरेन ने लिखा कि दिशोम गुरु का जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह समता, सामाजिक न्याय, आदिवासी पहचान, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और शोषित-वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए एक अनवरत संघर्ष की कहानी है.

झारखंड राज्य निर्माण का संघर्ष

हेमंत सोरेन ने यह भी याद दिलाया कि शिबू सोरेन के नेतृत्व में चले दशकों लंबे आंदोलन ने ही झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया. यह संघर्ष केवल एक भू-राजनीतिक मांग नहीं था, बल्कि आदिवासी समाज के आत्मसम्मान और अस्तित्व की लड़ाई थी. उन्होंने केंद्र सरकार को पद्म भूषण की घोषणा के लिए धन्यवाद दिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि गुरुजी का कद किसी एक सम्मान से कहीं बड़ा है.

सम्मान या सियासत?

शिबू सोरेन को पद्म भूषण मिलने के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जाना चाहिए. पप्पू यादव और हेमंत सोरेन के बयानों ने इस मुद्दे को सिर्फ सम्मान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आदिवासी अस्मिता और राजनीतिक संवेदनशीलता से भी जोड़ दिया है. आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है.

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