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हिंदुओं की सुरक्षा, घुसपैठ पर सख्ती और संगठन में समावेश—RSS प्रमुख का बहुआयामी संदेश

Swaraj Times Desk: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति पर चिंता जताते हुए बड़ा बयान दिया है। मुंबई में आयोजित संघ के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि यदि बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर खड़े होने का निर्णय लेते हैं, तो दुनिया भर के हिंदू उनके समर्थन में खड़े होंगे। उनका यह बयान क्षेत्रीय हालात को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता के बीच आया है।

भागवत ने संकेत दिया कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों पर दबाव और हमलों की खबरें चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को भय के माहौल में नहीं जीना चाहिए। उनके अनुसार, सांस्कृतिक और मानवीय आधार पर विश्व हिंदू समाज स्वाभाविक रूप से पीड़ितों के साथ खड़ा होता है।

इसी मंच से उन्होंने भारत में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों के मुद्दे को भी उठाया। भागवत ने नागरिकों से अपील की कि संदिग्ध गतिविधियों या अवैध निवास की जानकारी प्रशासन को दें और ऐसे लोगों को रोजगार देने से बचें। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन बनाए रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। साथ ही यह भी जोड़ा कि कानून के दायरे में रहकर ही कदम उठाए जाने चाहिए।

अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने संगठनात्मक संरचना पर भी बात की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ में नेतृत्व किसी जाति विशेष तक सीमित नहीं है। कार्य और समर्पण के आधार पर कोई भी व्यक्ति सरसंघचालक बनने की क्षमता रखता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लोग भी शामिल हैं। यह बयान संगठन में समावेशिता के संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

भागवत ने बांग्लादेश की मौजूदा अस्थिरता का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां हाल के वर्षों में सामाजिक तनाव बढ़ा है और अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर असुरक्षा की भावना सामने आई है। उन्होंने शांति, संवाद और पारस्परिक सम्मान को ही दीर्घकालिक समाधान बताया।

इस भाषण के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। एक तरफ इसे वैश्विक हिंदू एकजुटता का संदेश माना जा रहा है, तो दूसरी ओर घुसपैठ और नागरिकता के मुद्दे पर बयान ने नई चर्चा छेड़ दी है।

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