India US Trade Deal: भारत-अमेरिका समझौते पर कांग्रेस का वार—विदेश नीति पर ‘दबाव की राजनीति’ का आरोप
Swaraj Times Desk: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने इस डील पर कड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति और ऊर्जा खरीद जैसे फैसलों की घोषणा अमेरिका क्यों कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह तय करना कि भारत रूस, वेनेजुएला, ईरान या किसी और देश से तेल खरीदेगा या नहीं—यह अधिकार सिर्फ भारत का होना चाहिए।
“घोषणा दिल्ली करे, वॉशिंगटन नहीं”
पायलट ने हैरानी जताई कि इतने बड़े और संप्रभु देश होने के बावजूद भारत से जुड़े बड़े फैसलों की सार्वजनिक घोषणा अमेरिका की ओर से हो रही है। उनका कहना था कि अगर भारत ऊर्जा स्रोत बदलता भी है तो उसकी जानकारी भारत सरकार दे, न कि कोई विदेशी नेता।
ट्रेड डील या दबाव की राजनीति?
कांग्रेस नेता ने कहा कि अमेरिका द्वारा टैरिफ 18% तक घटाने को उपलब्धि बताना भ्रम पैदा करता है। उनके मुताबिक, पहले जहां कम दरें थीं, वहां अब भी ऊंचा शुल्क लागू है। उन्होंने इसे “दबाव में किया गया समझौता” बताया और सवाल उठाया कि इससे भारत के मध्यम वर्ग, किसानों और युवाओं को क्या ठोस फायदा होगा।
विदेश नीति पर स्वायत्तता की बात
पायलट ने यह भी कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र रही है। उन्होंने दोहराया कि किस देश से व्यापार करना है या ऊर्जा खरीदनी है, इसका निर्णय रणनीतिक और आर्थिक हितों को देखकर भारत को खुद लेना चाहिए—किसी बाहरी दबाव में नहीं।
तेल आयात पर विवाद
अमेरिका की ओर से यह संकेत दिए गए कि भारत रूस से तेल आयात कम करेगा और अन्य देशों से खरीदेगा। पायलट ने इसे भारत की संप्रभुता से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि अगर भारत कोई बदलाव करता है तो वह राष्ट्रीय हितों के आधार पर होगा, न कि किसी एक देश की इच्छा से।
राजनीतिक बहस तेज
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता आर्थिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से परख रहा है। पायलट के बयान से साफ है कि आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस मुद्दे पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
यह विवाद सिर्फ टैरिफ या तेल आयात का नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की स्वायत्तता और वैश्विक मंच पर उसके निर्णयों की स्वतंत्रता से भी जुड़ गया है।
