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गठबंधन की मुस्कान के पीछे सियासी तल्खी—ठाणे की जमीन पर फिर उभरी BJP-शिवसेना टकराहट

Swaraj Times Desk: महाराष्ट्र की महायुति सरकार में सबकुछ सामान्य दिखे, ऐसा जरूरी नहीं. ताजा बयानबाज़ी ने संकेत दिए हैं कि बीजेपी और एकनाथ शिंदे नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच अंदरूनी खींचतान अब सार्वजनिक होने लगी है. राज्य मंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता गणेश नाईक ने बिना नाम लिए डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर ऐसा निशाना साधा, जिसने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है.

क्या कहा गणेश नाईक ने?

ठाणे में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान नाईक ने कहा कि अगर बीजेपी नेतृत्व ने किसी को “मनमानी की छूट” दी, तो उसका “नाम और अस्तित्व मिट सकता है.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह पहले भी ऐसी चेतावनी दे चुके हैं और आज फिर वही बात दोहरा रहे हैं. भले ही उन्होंने शिंदे का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे शिंदे पर सीधा इशारा माना जा रहा है—खासकर इसलिए क्योंकि ठाणे को शिंदे का मजबूत गढ़ समझा जाता है.

ठाणे और नवी मुंबई की सियासत बना वजह?

नाईक और शिंदे के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नई नहीं है. नवी मुंबई, ठाणे और कल्याण-डोंबिवली जैसे इलाकों में प्रभाव को लेकर दोनों खेमों में लंबे समय से तनाव रहा है. हालिया स्थानीय निकाय चुनावों के बाद यह असंतोष और खुलकर सामने आया. नाईक का मानना है कि नगर निगम और परिषदों के चुनावों में गठबंधन के बजाय अलग-अलग लड़ना चाहिए, ताकि जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका मिले.

उन्होंने कहा कि बीजेपी अनुशासित पार्टी है और कार्यकर्ता आदेश का पालन करते हैं, भले ही वे निजी तौर पर असहमत हों. यह बयान भी इशारा करता है कि पार्टी के भीतर स्थानीय स्तर पर असंतोष दबा हुआ है.

‘कोई गढ़ किसी का नहीं’—नाईक का संदेश

ठाणे को शिवसेना का गढ़ बताए जाने पर नाईक ने दो टूक कहा कि राजनीति में कोई इलाका स्थायी रूप से किसी का नहीं होता. उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने नवी मुंबई और मीरा-भयंदर में मजबूत पकड़ बनाई थी और ठाणे में भी कड़ी टक्कर दी थी.

शिंदे खेमे की प्रतिक्रिया

इन टिप्पणियों के बाद शिवसेना (शिंदे गुट) की ओर से भी जवाब आया. राज्य के मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा कि “कोई कितना भी बोले, एकनाथ शिंदे मजबूत नेता हैं.” उन्होंने ठाणे में शिवसेना की जमीनी पकड़ और चुनावी प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि शिंदे ने खुद को कई बार साबित किया है.

गठबंधन पर असर पड़ेगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाज़ी भले ही स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई से जुड़ी हो, लेकिन इसका असर राज्य की सत्ता संतुलन पर भी पड़ सकता है. बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) दोनों ही महाराष्ट्र में अपने-अपने आधार को मजबूत करना चाहते हैं. ऐसे में सीट बंटवारे, स्थानीय नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर मतभेद सामने आना स्वाभाविक माना जा रहा है.

फिलहाल गठबंधन कायम है, लेकिन इन बयानों ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता की साझेदारी के पीछे सियासी प्रतिस्पर्धा अब भी जिंदा है.

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