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3 बार की बांग्लादेशी PM, जिन्होंने ISI के लिए ढाका का दरवाज़ा खोला
भारत-विरोध को बनाया अपनी राजनीति का आधार

Swaraj Times Desk: बांग्लादेश एक बार फिर बड़े राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। धार्मिक कट्टरवाद, हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरों के बीच, मंगलवार (30 दिसंबर) को पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का ढाका में निधन हो गया। 80 वर्षीय खालिदा जिया लंबे समय से बीमार थीं, और अब जब उनके बेटे तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे बताए जा रहे हैं — ऐसे में उनका अतीत और भारत के प्रति उनका रुख एक बार फिर चर्चा में है।

पाकिस्तान की जड़ें, भारत-विरोध की नींव

1945 में जन्मीं खालिदा का परिवार 1947 के विभाजन के बाद दिनाजपुर (अब बांग्लादेश) आ गया, उनका मूल नाम था — खालिदा खानम पुतुल। 1965 में उन्होंने पाकिस्तानी सेना के अधिकारी जियाउर रहमान से शादी की और पाकिस्तान चली गईं। शादी के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर “खालिदा जिया” रखा — यहीं से उनके व्यक्तित्व में पाकिस्तान की छाप और मजबूत होती दिखाई देती है।

बांग्लादेश की राजनीति में खालिदा जिया का उदय पति की हत्या के बाद हुआ। 1984 में उन्होंने BNP की कमान संभाली और 1991 में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद 1996 और 2001–06 तक वे दो और कार्यकालों में सत्ता में रहीं।

हमेशा भारत-विरोधी रहीं खालिदा

विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी राजनीति की “बेस” ही भारत-विरोधी राष्ट्रवाद रहा।
उनके कार्यकाल में—

  • ISI को ढाका में मजबूत और सक्रिय नेटवर्क बनाने की अनुमति मिली
  • पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूहों — ULFA, NSCN आदि को आश्रय मिला
  • भारत के साथ संबंधों को “गुलामी की मानसिकता” कहकर नकारा गया

उन्होंने 1972 की भारत–बांग्लादेश मैत्री संधि को गुलामी की संधि बताया और 1996 की गंगा जल संधि को भी अपमानजनक कहकर विरोध किया।

प्रणब मुखर्जी से मिलने से किया था इनकार

मार्च 2013 में जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ढाका के दौरे पर थे, तब खालिदा जिया ने उनसे मुलाकात करने से इनकार कर दिया। तब भारत में UPA सरकार थी, और जिया ने यह कहते हुए मुलाकात ठुकराई —
“दिल्ली, हसीना सरकार को ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो दे रही है।”
यह घटना भारत–बांग्लादेश संबंधों में उन्हें “सबसे कट्टर भारत-विरोधी चेहरे” के रूप में स्थापित करती है।

भारत यात्रा – बस औपचारिकता

PM रहते हुए उन्होंने 2006 में भारत का दौरा किया और डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात की।
उनकी अंतिम भारत यात्रा 2012 में हुई — उस समय वे विपक्ष की नेता थीं।


खालिदा जिया केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं थीं, बल्कि बांग्लादेश में भारत-विरोधी कट्टर राष्ट्रवाद को जमीन देने वाली सबसे प्रभावशाली नेता रहीं। अब उनके बेटे तारिक रहमान की राजनीति उसी रास्ते पर आगे बढ़ेगी या बांग्लादेश बदलेगा — यह फरवरी के चुनाव तय करेंगे।

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