Iran America Nuclear Talk: 12 दिन के संघर्ष के बाद फिर डिप्लोमेसी की राह, ओमान निभाएगा मध्यस्थ की भूमिका
Swaraj Times Desk: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान और अमेरिका एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौटे हैं। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi जिनेवा पहुंच चुके हैं, जहां अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ परमाणु कार्यक्रम पर अप्रत्यक्ष वार्ता का दूसरा दौर होना है। यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब क्षेत्र में सैन्य हलचल तेज है और पिछले साल हुए 12 दिन के संघर्ष की स्मृतियां अभी ताज़ा हैं।
किसे मिली मध्यस्थता की जिम्मेदारी?
इस संवेदनशील वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका Oman निभा रहा है। इससे पहले 6 फरवरी को मस्कट में पहली बैठक भी ओमान की मेजबानी में हुई थी। अब जिनेवा में होने वाली बैठक को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी उसी पर है। स्विट्जरलैंड ने भी मेजबान देश के रूप में बातचीत की पुष्टि की है।
असली मुद्दा क्या है?
वार्ता का केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। तेहरान का दावा है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन वह यूरेनियम को 60% तक संवर्धित कर चुका है—जो हथियार-ग्रेड स्तर (90%+) से बहुत दूर नहीं माना जाता। यही बात अमेरिका की चिंता का सबसे बड़ा कारण है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ कहा है कि ईरान को किसी भी स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समझौता नहीं हुआ तो “सभी विकल्प खुले हैं।” दूसरी ओर, ईरान ने भी कहा है कि किसी हमले की स्थिति में वह कड़ा जवाब देगा।
जिनेवा यात्रा क्यों अहम?
जिनेवा में अरागची की मुलाकात स्विस विदेश मंत्री, ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख Rafael Grossi से भी हो सकती है। यह संकेत है कि बातचीत केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि बहुपक्षीय समर्थन के साथ आगे बढ़ रही है।
ईरान ने यूरोपीय देशों की भूमिका को सीमित बताते हुए खाड़ी देशों—खासकर ओमान और कतर—को अधिक प्रभावी मध्यस्थ माना है। इससे साफ है कि क्षेत्रीय संतुलन भी इस वार्ता में अहम भूमिका निभा रहा है।
जंग की आशंका या शांति की राह?
जून 2024 में इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों का संघर्ष हुआ था, जिसमें अमेरिका ने ईरानी परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी। उसी के बाद वार्ता पटरी से उतर गई थी। अब दोनों पक्ष कूटनीतिक समाधान तलाशने की बात कर रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि जिनेवा वार्ता सफल रहती है तो क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है। लेकिन असफलता की स्थिति में मध्य-पूर्व एक बड़े टकराव की ओर बढ़ सकता है।
दुनिया की निगाहें अब जिनेवा पर हैं—क्या ईरान और अमेरिका शांति का रास्ता चुनेंगे या टकराव की दिशा में कदम बढ़ाएंगे? आने वाले दिनों में इसका जवाब साफ होगा।
