Iran Israel War: ईरान-इजरायल जंग के बीच सुप्रीम लीडर की मौत पर वैश्विक हलचल, भारत की आधिकारिक चुप्पी पर सियासी बहस तेज
Swaraj Times Desk: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान ने 1 मार्च को पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की 28 फरवरी 2026 को तेहरान में हुई संयुक्त अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाई में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि यह हमला उनके आवासीय परिसर पर किया गया, जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारी भी मारे गए। ईरान ने 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा करते हुए जवाबी हमले तेज कर दिए हैं।
ईरानी मीडिया के मुताबिक यह कार्रवाई इज़राइल के “Roar of the Lion” ऑपरेशन का हिस्सा थी, जिसमें अमेरिका ने सहयोग किया। रूस और चीन समेत कई देशों ने इस घटना की निंदा की है, जबकि कुछ पश्चिमी देशों ने इसे आत्मरक्षा का कदम बताया है।
क्षेत्रीय तनाव चरम पर
खामेनेई की हत्या के बाद मध्य एशिया और खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। दुबई, रियाद, कतर और ओमान जैसे इलाकों में मिसाइल हमलों की खबरें सामने आई हैं। हालात इतने संवेदनशील हैं कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति दोनों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
भारत की चुप्पी पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक लेख के जरिए भारत सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत की स्पष्ट और संतुलित प्रतिक्रिया क्यों सामने नहीं आई। उनके मुताबिक, भारत को अपनी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष और शांति समर्थक नीति के अनुरूप स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
सोनिया गांधी ने यह भी संकेत दिया कि पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों पर पड़ सकता है। ऐसे में कूटनीतिक सक्रियता बेहद जरूरी है।
कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति बेहद जटिल है। एक ओर उसके अमेरिका और इज़राइल से रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा सहयोग। ऐसे में कोई भी बयान संतुलन साधते हुए देना होगा।
खामेनेई की मौत ने न केवल ईरान की राजनीति को झकझोर दिया है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी गहरा असर डाला है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भारत समेत प्रमुख देश इस संकट में किस तरह की भूमिका निभाते हैं।
